
प्रायः कुतो गृहगते परमात्मबोधः,
शुद्धात्मनो भुवि यतः पुरुषार्थसिद्धिः ।
दानात्पुनर्ननु चतुर्विधतः करस्था,
सा लीलयैव कृतपात्रजनानुषङ्गात्॥15॥
आत्मज्ञान पुरुषार्थ सिद्धि, प्राय: न गृही को हो सकती ।
किन्तु चतुर्विध पात्रदान से, पल भर में प्राप्त हो सिद्धि॥
अन्वयार्थ : जिस परमात्मा के ज्ञान से धर्म-अर्थ-काम और मोक्षरूप चार पुरुषार्थों की सिद्धि होती है, उस परमात्मा का ज्ञान, सम्यग्दृष्टि को घर में रह कर प्रायः नहीं हो सकता; परन्तु उन पुरुषार्थों की सिद्धि उत्तम आदि पात्रों को आहार, औषध, अभय तथा शास्त्ररूप चार प्रकार के दान के देने से पल भर में हो जाती है । इसलिए धर्म अर्थ आदि पुरुषार्थों के अभिलाषी सम्यग्दृष्टियों को उत्तम आदि पात्रों को अवश्य दान देना चाहिए ।