+ भोजन, औषधि आदि द्वारा मुनियों का उपकार करने की प्रेरणा -
नामापि यः स्मरति मोक्षपथस्य साधो-,
राशु क्षयं व्रजति तद्दुरितं समस्तम् ।
यो भक्त-भेषज-मठादि-कृतोपकारः,
संसारमुत्तरति सोऽत्र नरो न चित्रम्॥16॥
नाममात्र ले जो मुनिवर का, तो क्षण में नशते सब पाप ।
क्या आश्चर्य किभोजनादि, देकर होवें भवसागर पार॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, मोक्षार्थी साधु का नाममात्र भी स्मरण करता है, उसके समस्त पाप, क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं; किन्तु जो भोजन, औषधि, मठ आदि बनवा कर, मुनियों का उपकार करता है, वह संसार से पार हो जाता है, इसमें आश्चर्य ही क्या है ?