
किं ते गृहा: किमिह ते गृहिणो नु येषां,
अन्तर्मनस्सु मुनयो न हि संचरन्ति ।
साक्षादथ स्मृति-वशाच्चरणोदकेन,
नित्यं पवित्रितधराग्रशिरःप्रदेशाः॥17॥
जिनके चरणोदक से हो, नित गृह एवं मस्तक पावन ।
जिस मन में मुनि-वास नहीं, वह घर एवं श्रावक निष्फल॥
अन्वयार्थ : जिन मुनियों के चरण-कमल के जल-स्पर्श से जिन घरों की भूमि पवित्र हो जाती है, जिन गृहस्थों के मस्तक भी पवित्र हो जाते हैं; उन उत्तम मुनियों का जिन घरों में संचार नहीं है तथा जिन गृहस्थों के मन के भीतर भी जिन मुनियों का प्रवेश नहीं है, वे घर व गृहस्थ, दोनों ही बिना प्रयोजन के हैं । इसलिए गृहस्थों को उत्तमादि पात्रों को अवश्य दान देना चाहिए, जिससे मुनियों के आगमन से उनके घर पवित्र बने रहें तथा उनका गृहस्थपना भी कार्यकारी गिना जाए ।