+ पात्रदान के बिना सम्पदा किस काम की? -
देव: स किं भवति यत्र विकारभावो,
धर्म: स किं न करुणाङ्गिषु यत्र मुख्या ।
तत्किं तपो गुरुरथास्ति न यत्र बोधः,
सा किं विभूतिरिह यत्र न पात्रदानम्॥18॥
रागी कैसे देव हो सकें?दया नहीं तो धर्म कहाँ? ।
आत्मज्ञान बिन तप-गुरु कैसे? दान बिना वैभव का क्या?॥
अन्वयार्थ : वह देव कैसा? जिसके मन में स्त्री आदि को देख कर, विकार उत्पन्न होता है, वह धर्म किस काम का? जिसमें दया मुख्य नहीं मानी जाती है । वह तप तथा वह गुरु किस काम का? जिससे आत्मा आदि का ज्ञान नहीं होता तथा वह सम्पदा भी किस काम की? जिसके होने पर उत्तम आदि पात्रों को दान न दिया जाए ।