
किं ते गुणाः किमिह तत्सुखमस्ति लोके,
सा किं विभूतिरथ या न वशं प्रयाति ।
दान-व्रतादि-जनितो यदि मानवस्य,
धर्माे जगत्त्रयवशीकरणैकमन्त्र:॥19॥
दान और व्रतजन्य धर्म है, मन्त्र त्रिजग-वश होय जहाँ ।
उत्तम से उत्तम गुण सुख ऐश्वर्य आदि क्या नहीं वहाँ?॥
अन्वयार्थ : जिस मनुष्य के पास तीनों जगत् को वश करने में मन्त्रस्वरूप तथा दान-व्रत आदि से उत्पन्न हुआ धर्म मौजूद है; उस मनुष्य के पास उत्तमोत्तम गुण, उत्तमोत्तम सुख और उत्तमोत्तम ऐश्वर्य, सब अपने आप आकर वशीभूत हो जाते हैं । इसलिए उत्तमोत्तम गुण के अभिलाषियों को दान-व्रत आदि अवश्य करना चाहिए ।