
सत्पात्रदान-जनितोन्नत-पुण्यराशि:,
एकत्र वा परजने नरनाथलक्ष्मीः ।
आद्यात्परस्तदपि दुर्गत एव यस्मात्,
आगामिकालफलदायि न तस्य किंचित्॥20॥
कोई दान से पुण्य करे अरु, कोई करे वैभव का भोग ।
दाता फल पाए भविष्य में, भोगी को फल नहीं मनोग॥
अन्वयार्थ : एक मनुष्य तो उत्तम पात्रदान से पैदा हुए श्रेष्ठ पुण्य का संचय करता है और दूसरा राज्य-लक्ष्मी का अच्छी तरह भोग करता है, परन्तु उन दोनों में राज्य-लक्ष्मी का भोग करने वाला दूसरा पुरुष ही दरिद्री है क्योंकि आगामी काल में उसको किसी प्रकार की सम्पत्ति आदि का फल नहीं मिल सकता, किन्तु पात्रदान करने वाले को तो आगामी काल में उत्तम सम्पदारूपी फलों की प्राप्ति होती है । इसलिए भव्य जीवों को खूब दान देकर पुण्य का संचय करना चाहिए ।