+ धन की दान देने में ही सार्थकता -
दानाय यस्य न धनं न वपुर्व्रताय,
नैवं श्रुतं च परमोपशमाय नित्यम् ।
तज्जन्म केवलमलं मरणाय भूरि-,
संसारदुःखमृतिजातिनिबन्धनाय॥21॥
दान हेतु धन, विरति हेतु तन, श्रुत नहिं उपशम हेतु जहाँ ।
विविध क्लेश को भोग, मरण के लिए जन्म है हुआ वहाँ॥
अन्वयार्थ : जिस मनुष्य का धन, दान के लिए नही है; शरीर, व्रत के लिए नहीं है और शास्त्र, उत्तम शान्ति को प्राप्त करने के लिए नहीं हैं उस मनुष्य का जन्म, संसार के जन्म-मरण आदि अनेक दुःखों को भोगने के कारण मरण के लिए ही है ।