
प्राप्ते नृजन्मनि तपः परमस्तु जन्तोः,
संसार-सागर-समुत्तरणैक-सेतुः ।
मा भूद्विभूतिरिह बन्धन-हेतुरेव,
देवे गुरौ शमिनि पूजनदानहीना॥22॥
नर-भव में भव-सागर-पार, उतरने को तप-सेतु मिले ।
बन्ध हेतु अरु पूजन-दान-विहीन विभूति न हो मुझको॥
अन्वयार्थ : अत्यन्त दुर्लभ इस मनुष्य भव के प्राप्त होने पर मनुष्य को संसार-समुद्र से पार होने के लिए पुल के समान श्रेष्ठ तप का मिलना श्रेष्ठ ही है; परन्तु इस लोक में अर्हन्त और गुरु के पूजन तथा दान के उपयोग में न आने वाली और केवल कर्मबन्ध की ही कारण ऐसी विभूति की कोई आवश्यकता नहीं है ।