
भिक्षा वरं परिहृताऽखिलपापकारि-,
कार्यानुबन्धविधुराश्रितचित्तवृत्तिः ।
सत्पात्रदान-रहिता विततोग्र-दुःख-,
दुर्लंघ्य-दुर्गतिकरी न पुनर्विभूतिः॥23॥
पापजनक कर्माें के दु:ख से दूर रखे वह भिक्षा श्रेष्ठ ।
पात्र दान बिन विविध दु:खद दुर्गतिदायक वैभव नहीं श्रेष्ठ॥
अन्वयार्थ : जिस भिक्षा के होने पर चित्त की वृत्ति, समस्त प्रकार के पाप को पैदा करने वाले कार्यों के सम्बन्ध से दुःखित नहीं होती - ऐसी भिक्षा तो उत्तम है, किन्तु विस्तीर्ण नाना प्रकार के दुःखों से पार करने में असमर्थ, दुर्गति को देने वाली तथा उत्तम आदि पात्रों के दान के उपयोग से रहित विभूति की कोई आवश्यकता नहीं है ।