
कार्यं तपः परमिह भ्रमता भवाब्धौ,
मानुष्यजन्मनि चिरादतिदुःखलब्धे ।
सम्पद्यते न तदणुव्रतिनाऽपि भाव्यं,
जायेत चेदहरहः किल पात्रदानम्॥25॥
भव में भ्रमते प्राणी दुर्लभ, नरगति पाकर तप धारें ।
कर न सकें तप तो अणुव्रत ले, श्रेष्ठ पात्र को दान करें॥
अन्वयार्थ : चिरकाल से इस संसाररूपी समुद्र में भ्रमण करते हुए प्राणियों को कष्ट से इस मनुष्य भव की प्राप्ति हुई है । इसलिए इस मनुष्य जन्म में अवश्य तप करना चाहिए । यदि तप न हो सके तो अणुव्रत ही धारण करना चाहिए, जिससे प्रतिदिन निश्चय से उत्तम आदि पात्रों को दान दिया जाए ।