
ग्रामान्तरं व्रजति यः स्वगृहाद् गृहीत्वा,
पाथेयमुन्नततरं स सुखी मनुष्यः ।
जन्मान्तरं प्रविशतोऽस्य तथा व्रतेन,
दानेन चाऽर्जितशुभं सुखहेतुरेकम्॥26॥
घर से पाथेय मनुज ले, तो ग्रामान्तर सुख से जाये ।
दान-व्रतों से हुआ पुण्य जो, जन्मान्तर में सुख देवे॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार जो मनुष्य, अपने घर से अच्छी तरह पाथेय लेकर दूसरे गाँव को जाता है तो वह सुखी रहता है; उसी प्रकार जो मनुष्य, परलोक को गमन करता है तो उसे व्रत तथा दान से पैदा किया हुआ, एक पुण्य ही सुख का कारण होता है । इसलिए जो मनुष्य, परलोक में सुख के अभिलाषी हैं, उनको व्रतों को धारण कर, और दान देकर, खूब पुण्य का संचय करना चाहिए ।