+ दान का संकल्प भी पुण्य का उत्पादक -
यत्नः कृतोऽपि मदनार्थयशोनिमित्तं,
दैवादिह व्रजति निष्फलतां कदाचित् ।
संकल्पमात्रमपि दानविधौ तु पुण्यं,
कुर्यादसत्यपि हि पात्रजने प्रमोदात्॥27॥
काम-भोग-धन-यश के उद्यम, निष्फल हों पापोदय से ।
उत्तम पात्र न होवे फिर भी, दान भाव से पुण्य बँधे॥
अन्वयार्थ : यद्यपि संसार में काम-भोग के लिए, धन के लिए अथवा यश के लिए किया हुआ प्रयत्न भी दैवयोग से किसी समय निष्फल हो जाता है, परन्तु उत्तम आदि पात्रों के नही होने पर भी 'हर्षपूर्वक दान देंगे' - ऐसा दान का संकल्प भी पुण्य का करने वाला होता है । इसलिए ऐसे उत्तम दान का मनुष्यों को अवश्य ध्यान रखना चाहिए ।