+ नवधाभक्तिपूर्वक आहारदान का कारण -
सद्मागते किल विपक्षजनेऽपि सन्त:,
कुर्वन्ति मानमतुलं वचनाशनाद्यै: ।
यत्तत्र चारु-गुण-रत्न-निधान-भूते,
पात्रे मुदा महति किं क्रियते न शिष्टैः॥28॥
मधुर वचन-भोजन से सज्जन, करते आगत अरि का मान ।
क्यों न करें उत्तम गुणधारी, का हर्षित होकर बहुमान॥
अन्वयार्थ : वैरी भी यदि अपने घर आए तो सज्जन मनुष्य, मधुर-मधुर वचनों तथा भोजन आदि से उसका बड़ा भारी सन्मान करते हैं । फिर जो उत्तम सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय के धारी हैं तथा पूज्य हैं - ऐसे पात्रों में सज्जन हर्षपूर्वक क्या नहीं करेंगे?