+ दान के बिना समस्त विभूति कर्मबन्ध का कारण -
सूर्नोृतेरपि दिनं न सतस्तथा स्याद्,
बाधाकरं बत यथा मुनिदानशून्यम् ।
दुर्वारदुष्टविधिना न कृते ह्यकार्ये,
पुंसा कृते तु मनुते मतिमाननिष्टम्॥29॥
पुत्र-मरण से भी दु:ख ज्यादा, दु:ख होता मुनिदान बिना ।
पापोदय का कार्य अनिष्ट न, है अनिष्ट निजकृत दुष्कार्य॥
अन्वयार्थ : आचार्य कहते हैं कि सज्जन पुरुष को पुत्र के मरने का दिन भी उतना दुःख देने वाला नहीं होता, जितना कि मुनियों को दानरहित दिन, दुःख देने वाला होता है क्योंकि विद्वान् पुरुष, दुर्दैव से किए हुए बुरे कार्य को उतना अनिष्ट नहीं मानते, जितना अपने द्वारा किए हुए बुरे कार्यों को अनिष्ट मानते हैं । इसलिए विद्वानों को अपने द्वारा करने योग्य दानरूपी कार्य अवश्य करना चाहिए ।