+ पात्रदान के प्रभाव से ही धर्मकार्यों की सार्थकता -
ये धर्मकारणसमुल्लसिता विकल्पा:,
त्यागेन ते धनयुतस्य भवन्ति सत्याः ।
स्पृष्टाः शशांककिरणैरमृतं क्षरन्त:,
चन्द्रोपलाः किल लभन्त इह प्रतिष्ठाम्॥30॥
चन्द्र-किरण-स्पर्श बिना नहिं, चन्द्रकान्त से नीर झरे ।
धर्म कार्य के कोई उद्यम, दान बिना नहिं फल देते॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार किसी मकान में चन्द्रकान्त मणि लगी हुई है, लेकिन जब तक उसके साथ चन्द्रमा की किरणों का स्पर्श नहीं होता, तब तक उनसे पानी नहीं झर सकता; इसलिए उस समय उनकी कोई प्रतिष्ठा नहीं करता, किन्तु जिस समय चन्द्रमा के स्पर्शित होने से उनसे पानी निकलता है, उस समय उनकी बड़ी भारी प्रतिष्ठा होती है । उसी प्रकार धनी पुरुष के चित्त में जो जिन-मन्दिर बनवाना, तीर्थ-यात्रा करना आदि धर्म के कारण उत्पन्न होते हैं, वे बिना पात्र-दान के सत्यभूत नहीं समझे जाते, किन्तु पात्र-दान से ही वे सत्य समझे जाते हैं । इसलिए गृहस्थियों को पात्रदान अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह सब में मुख्य है ।