
मन्दायते य इह दानविधौ धनेऽपि,
सत्यात्मनो वदति धार्मिकताञ्च यत्तत् ।
माया हृदि स्फुरति सा मनुजस्य तस्य,
या जायते तडिदमुत्र सुखाचलेषु॥31॥
धन है पर जो दान न देता, अपने को धर्मी माने ।
उसके उर में माया उछले, सर्व सुखों का नाश करे॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, धन के होते हुए भी दान देने में आलस्य करता है तथा अपने को धर्मात्मा कहता है, वह मनुष्य मायाचारी है अर्थात् उस मनुष्य के हृदय में कपट भरा हुआ है । उसका वह कपट, दूसरे भव में उसके समस्त सुखों का नाश करने वाला है, परलोक में उसके सुखरूपी पर्वतों के विनाश के लिए बिजली का काम करता है ।