
मिथ्यादृशोऽपि रुचिरेव मुनीन्द्रदाने,
दद्यात् पशोरपि हि जन्म सुभोगभूौ ।
कल्पाङ्घिपा ददति यत्र सदेप्सितानि,
सर्वाणि तत्र विदधाति न किं सुदृष्टेः॥33॥
पात्रदान-रुचि से अज्ञानी, पशु भी भोगभूमि जाए ।
तो साक्षात् दान दे ज्ञानी, कहो कौन सुख नहिं पाए?॥
अन्वयार्थ : मुनि आदि उत्तम पात्रदान में मिथ्यादृष्टि पशु के द्वारा की हुई केवल रुचि ही जब उनको उत्तम भोगभूमि आदि के सुखों को देने वाली होती है, तब साक्षात् दान को देने वाले सम्यग्दृष्टि को तो वह दान क्या-क्या इष्ट तथा उत्तम चीजों को नहीं देगा?