+ द्रव्यानुसार दान नहीं देने में मूर्ख पुरुष का उदाहरण -
दानाय यस्य न समुत्सहते मनीषा,
तद्योग्यसम्पदि गृहाभिमुखे च पात्रे ।
प्राप्तं खनावपि महार्घ्यतरं विहाय,
रत्नं करोति विमतिस्तलभूमिभेदम्॥34॥
मुनि आवें घर तो भी जिसको, दान हेतु उत्साह नहीं ।
महारतन को छोड़ व्यर्थ, वह खोद रहा पाताल मही॥
अन्वयार्थ : योग्य सम्पदा के होने पर भी तथा मुनि के घर आने पर भी, जिस मनुष्य की बुद्धि, दान देने में उत्साहित नहीं होती अर्थात् जो दान देना नहीं चाहता; वह मूर्ख पुरुष, खानि में मिले हुए अमूल्य रत्न को छोड़ कर, व्यर्थ पाताल की भूमि को खोदता है ।