
नष्टा मणीरिव चिराज्जलधौ भवेऽस्मिन्,
आसाद्य चारुनरतार्थजिनेश्वराज्ञाः ।
दानं न यस्य स जडः प्रविशेत् समुद्रं,
सच्छिद्रनावमधिरुह्य गृहीतरत्नः॥35॥
उत्तम नरभव धन जिन-आज्ञा, मिली उदधि में मणी समान ।
दान न दे, वह तरे कैसे, चढ़ सछिद्र नौका-सम जान॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, चिरकाल से समुद्र में पड़ी हुई मणि के समान इस संसार में उत्तम मनुष्यत्व, धन और जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा को प्राप्त कर भी, उत्तम आदि पात्रों को दान नहीं देता; वह मूर्ख मनुष्य, टूटी-फूटी नाव पर चढ़ कर, बहुत-से रत्नों को साथ में लेकर, दूसरे द्वीप में जाने के लिए समुद्र में प्रवेश करता है - ऐसा समझना चाहिए ।