
यस्यास्ति नो धनवतः किल पात्रदानं-
अस्मिन्परत्र च भवे यशसे सुखाय ।
अन्येन केनचिदनून-सुपुण्य-भाजा,
क्षिप्तः स सेवकनरो धनरक्षणाय॥36॥
कीर्ति और परभव-सुखदायक,धनी! यदि नहीं देवे दान ।
वह मालिक नहिं उसे किसी ने, रक्षा हेतु रखा है दास॥
अन्वयार्थ : जो धनी मनुष्य, इस भव में कीर्ति के लिए तथा परभव में सुख के लिए उत्तमादि पात्रों में दान नहीं देता तो समझना चाहिए कि वह उस धन का मालिक नहीं है, बल्कि किसी अन्य अति पुण्यवान् पुरुष ने उस मनुष्य को उस धन की रक्षा के लिए नियुक्त किया है ।