
चैत्यालये च जिनसूरिबुधार्चने च,
दाने च संयतजनस्य सुदुःखिते च ।
यच्चात्मनि स्वमुपयोगि तदेव नूनं,
आत्मीयमन्यदिह कस्यचिदन्यपुंसः॥37॥
चैत्यालय-बुध-सूरि-अर्चना, अरु संयत-दुखियों को दान ।
दिया वही धन अपना है, अन्यथा उसे पर का ही मान॥
अन्वयार्थ : जो धन, जिन-मन्दिर के काम में लगाया जाता है; जिसका उपयोग, जिनेन्द्र भगवान की पूजा में, आचार्यों की पूजा में, अन्य विद्वानों की पूजा में होता है; जो संयमीजनों के दान में खर्च किया जाता है; जो धन, दुःखितों को दिया जाता है और जो धन, अपने उपयोग में आता है; उस धन को तो अपना समझना चाहिए, किन्तु जिस धन का उक्त कामों में उपयोग न होवे तो उस धन को किसी और मनुष्य का धन समझना चाहिए ।