+ संयमी पात्रों के दान से लक्ष्मी बढ़ती है, घटती नहीं -
पुण्यक्षयात्क्षयमुपैति न दीयमाना,
लक्ष्मीरतः कुरुत सन्ततपात्रदानम् ।
कूपे न पश्यत जलं गृहिणः समन्तात्-
आकृष्यमाणमपि वर्धत एव नित्यम्॥38॥
यथा कूप से जल निकले, पर वह तो बढ़ता जाता है ।
पुण्य-क्षीण हो तो धन घटता, देने से नहिं घटता है॥
अन्वयार्थ : हे गृहस्थों! कुएँ में सदा चारों तरफ से जल निकलता रहता है, फिर भी वह निरन्तर बढता ही रहता है, घटता नहीं है; उसी प्रकार संयमी पात्रों के दान में व्यय की हुई लक्ष्मी, सदा बढ़ती ही जाती है, घटती नहीं, अपितु पुण्य के क्षय होने पर ही घटती है । इसलिए मनुष्य को सदा संयमी पात्रों को दान अवश्य देना चाहिए ।