
सर्वान् गुणानिह परत्र च हन्ति लोभः,
सर्वस्य पूज्यजन-पूजन-हानिहेतुः ।
अन्यत्र तत्र विहितेऽपि हि दोषमात्र-
मेकत्र जन्मनि परं प्रथयन्ति लोकाः॥39॥
पूज्यजनों की पूजा में, यह लोभ सर्व गुण घात करे ।
लौकिक कार्यों में लालच तो, इसी जन्म का दोष कहें॥
अन्वयार्थ : जो लोभ, अर्हन्त आदि पूज्यजनों की पूजा में हानि पहुँचाने वाला है; वह लोभ, इस भव तथा परभव में समस्त मनुष्यों के सम्यग्दर्शनादि गुणों को घातता है । लेकिन जो लोभ, लौकिक विवाह आदि कार्यों में किया जाता है, उस लोभ को तो इस जन्म में मनुष्य केवल दोष ही कहते हैं । अत: मनुष्य को दान-पूजनादि कार्यों में लोभ नहीं करना चाहिए ।