
जातोऽप्यजात इव स श्रियमाश्रितोऽपि,
रंक: कलंकरहितोऽप्यगृहीतनामा ।
कम्बोरिवाऽऽश्रित-मृतेरपि यस्य पुंसः,
शब्दः समुच्चलति नो जगति प्रकामम्॥40॥
मृत्यु बाद यदि दानजन्य यश, शंखनाद बन नहिं फैले ।
व्यर्थ जन्म वह धनी रंक है, निष्कलंक पर नाम न हो॥
अन्वयार्थ : जिस मनुष्य का दान से उत्पन्न हुए यश का शब्द, शंख की तरह मृत्यु के बाद भलीभाँति संसार में नहीं फैलता; वह मनुष्य, पैदा हुआ भी नहीं पैदा हुआ-सा है, लक्ष्मीवान् होकर भी दरिद्री ही है तथा कलंकरहित है तो भी कोई उसका नाम नहीं लेता । इसलिए मनुष्य को अवश्य दान देना चाहिए ।