
श्वापि क्षितेरपि विभुर्जठरं स्वकीयं,
कर्माेपनीतविधिना विदधाति पूर्ण् ।
किन्तु प्रशस्य-नृ-भवार्थ-विवेकितानां,
एतत्फलं यदिह सन्ततपात्रदानम्॥41॥
कर्माेदय अनुसार श्वान अरु, भूप स्वयं का पेट भरें ।
पात्रदान ही नरभव लक्ष्मी, ज्ञानी होने का फल है॥
अन्वयार्थ : संसार में कर्मानुसार कुत्ता भी अपने पेट को भरता है तथा अपने कर्मानुकूल राजा भी अपने पेट को भरते हैं, इसलिए पेट भरने में तो कुत्ता तथा राजा समान ही हैं, परन्तु उत्तम नरभव पाने का, श्रीमान् होने का तथा उत्तम विवेकी होने का केवल एक ही फल है कि निरन्तर उत्तमादि पात्रों को दान देना; इसलिए जो मनुष्य, उत्तम मनुष्यपने का, श्रीमान् होने का और विवेकी होने का अभिमान रखता है, उसको पात्रदान अवश्य देना चाहिए ।