
आयासकोटिभिरुपार्जितमङ्गजेभ्यो,
यज्जीवितादपि निजाद्दयितं जनानाम् ।
वित्तस्य तस्य नियतं प्रविहाय दानं,
अन्या विपत्तय इति प्रवदन्ति सन्त:॥42॥
किया उपार्जित विविध दु:खों से, अधिक इष्ट सुत प्राणों से ।
दान मात्र से सफल कहें धन, अन्य विपत्ति सन्त कहें॥
अन्वयार्थ : जो धन, परदेश जाकर, सेवा करके इत्यादि नाना प्रकार से पैदा किया गया है, जो मनुष्यों को अपने पुत्रों तथा जीवन से भी अधिक प्यारा है; उस धन की सफलता की एकमात्र गति दान ही है, उसकी दान को छोड़ कर और दूसरी कोई गति नहीं है, अन्य तो सब विपत्ति ही विपत्ति है - ऐसा सज्जन पुरुष कहते हैं; इसलिए समस्त प्रकार के सुख को देने वाला दान, मनुष्य को अवश्य करना चाहिए ।