+ धनोपार्जन की अपेक्षा पुण्योपार्जन की श्रेष्ठता -
नार्थः पदात्पदमपि व्रजति त्वदीयो,
व्यावर्तते पितृवनान्ननु बन्धुवर्गः ।
दीर्घे पथि प्रवसतो भवतः सखैकं,
पुण्यं भविष्यति ततः क्रियतां तदेव॥43॥
एक कदम भी साथ न दे धन, बन्धु मात्र जाते श्मशान ।
भव-वन में है मित्र पुण्य ही, अत: कमाओ करके दान॥
अन्वयार्थ : मरते समय यह तेरा धन, एक कदम से दूसरे कदम तक भी नहीं जाता है तथा बन्धुओं का समूह, श्मशान भूमि से ही लौट आता है; परन्तु इस दीर्घ संसार में भ्रमण करते हुए तुझको तेरा पुण्य ही एकमात्र मित्र होगा अर्थात् वही तेरे साथ जाएगा । इसलिए तुझे पुण्य का ही उपार्जन करना चाहिए ।