
न्यासश्च सद्म च करग्रहणञ्च सूनो:,
अर्थेन तावदिह कारयितव्यमास्ते ।
धर्माय दानमधिकाग्रतया करिष्ये,
सञ्चिन्तयन्नपि गृही मृतिमेति मूढः॥45॥
भवन बनाना, सुत-विवाह अरु, कुछ धन करना है विनियोग ।
फिर मैं दान करूँगा - ऐसा, सोच अचानक मृत्यु हो॥
अन्वयार्थ : मुझे जमीन में धन गाड़ना है, धन से मुझे मकान बनवाना है और पुत्र का विवाह करना है, इतने काम करने पर यदि अधिक धन होगा तो धर्म के लिए दान करूँगा - ऐसे विचार करते-करते मूर्ख प्राणी, अचानक मर जाता है और वह कुछ भी नहीं कर पाता; इसलिए मनुष्य को धन मिलने पर सबसे पहले दान करना चाहिए, दान के अतिरिक्त विचार कदापि नहीं करना चाहिए ।