
किं जीवितेनं कृपणस्य नरस्य लोके,
निर्भाेग-दान-धन-बन्धन-बद्ध-मूर्तेः ।
तस्माद्वरं बलिभुगुन्नतभूरिवाग्भि:,
व्याहूतकाककुल एव बलिं स भुंक्ते॥46॥
दान-भोग बिन धन से बँधे, कृपण के जीने से क्या लाभ? ।
ऊँचे स्वर में बुला अन्य को, फिर खाये वह काग भला॥
अन्वयार्थ : जिस लोभी पुरुष का शरीर, भोग तथा दान रहित धनरूपी बन्धन से बँधा हुआ है, उस कृपण पुरुष का इस लोक में जीना सर्वथा व्यर्थ है क्योंकि उस पुरुष की अपेक्षा वह काक ही अच्छा है, जो कि ऊँचे शब्द बोल कर और बहुत-से काकों को बुला कर, उनके साथ मिल कर भोजन करता है ।