
औदार्ययुक्त-जन-हस्त-परम्पराप्त-,
व्यावर्तनप्रसृतखेदभरातिखिन्नाः ।
अर्था गताः कृपणगेहमनन्तसौख्य-,
पूर्णा इवानिशमबाधमतिस्वपन्ति॥47॥
दानी के घर रहने वाला; वित्त, दान से दु:खी हुआ ।
अत: कृपण के घर जाकर वह, निर्बाधित सुख से सोता॥
अन्वयार्थ : आचार्य उत्प्रेक्षा करते हैं कि उदारता सहित मनुष्य के हाथों से पैदा हुए श्रम से अत्यन्त खेद उत्पन्न होता है; उससे खिन्न होकर, समस्त धन, कृपण के घर चला गया है तथा वहीं पर वह बाधा रहित आनन्द के साथ सोता है - ऐसा मालूम होता है ।