
उत्कृष्ट-पात्रमनगारमणुव्रताऽढ्यं,
मध्यं व्रतेन रहितं सुदृशं जघन्यम् ।
निर्दर्शनं व्रत-निकाय-युतं कुपात्रं,
युग्मोज्झितं नरमपात्रमिदञ्च विद्धि॥48॥
उत्तम पात्र महामुनि, मध्यम अणुव्रती, अव्रती जघन ।
व्रती कुदृष्टि है कुपात्र, अव्रती मूढ़जन पात्र नहीं ॥
अन्वयार्थ : उत्तम पात्र तो महाव्रती हैं, अणुव्रती मध्यम पात्र हैं, व्रतरहित सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र हैं, व्रतसहित मिथ्यादृष्टि कुपात्र हैं तथा अव्रती मिथ्यादृष्टि अपात्र है - ऐसा जानना चाहिए ।