
तेभ्यः प्रदत्तमिह दानफलं जनानां,
एतद्विशेषणविशिष्टमदुष्टभावात् ।
अन्यादृशेऽथ हृदये तदपि स्वभावात्,
उच्चावचं भवति किं बहुभिर्वचोभिः ॥49॥
निर्मल भावों से पात्रों को, दिया दान फल देता है ।
माया से दे तो भी जैसे, भाव करे फल वैसा है॥
अन्वयार्थ : अत्यन्त निर्मल भाव से उत्तम आदि पात्रों के लिए दिया हुआ दान, मनुष्यों को उत्तम आदि फल का देने वाला होता है; लेकिन जो दान, मायाचार अथवा दुष्ट परिणामों से दिया जाता है, वह भी स्वभाव से नीचे-ऊँचे फल को देने वाला होता है । इसलिए इस विषय में हम विशेष क्या कहें? - दान, अवश्य फल देने वाला होता है ।