
चत्वारि यान्यभयभेषजभुक्तिशास्त्र-,
दानानि तानि कथितानि महाफलानि ।
नान्यानि गोकनकभूमिरथाङ्गनादि-,
दानानि निश्चितमवद्यकराणि यस्मात् ॥50॥
औषधि-शास्त्र-अभय-आहार, चतुर्विध दान महाफल दें ।
गौ-सुवर्ण-रथ आदि दान तो, पापोत्पादक निन्द्य कहें ॥
अन्वयार्थ : आहार, औषध, अभय और शास्त्र - ऐसे दान चार प्रकार का है । वह चार प्रकार का दान तो महा फल को देने वाला कहा है, परन्तु इससे भिन्न गौ, सुवर्ण, जमीन, रथ, स्त्री आदि का दान, महा-फल को देने वाला नहीं है, वह तो निन्दा का कराने वाला ही है । इसलिए महा फल के अभिलाषियों को उक्त चार प्रकार का ही दान देना चाहिए ।