
दान-प्रकाशनमशोभन-कर्म-कार्य-
कार्पण्य-पूर्ण-हृदयाय न रोचतेऽदः ।
दोषोज्झितं सकललोकसुखप्रदायि-
तेजो रवेरिव सदा हतकौशिकाय॥52॥
मोह-तिमिर से कृपण अन्ध को, दान-प्रकाश न रुचता है ।
उल्लू को ज्यों रात्रि-विहीन, सुखद रवि-तेज न रुचता है॥
अन्वयार्थ : आचार्य कहते हैं कि खोटे मिथ्यात्वरूपी कर्म का कार्य कृपणता है, उससे जिसका हदय भरा हुआ है - ऐसे कृपण पुरुष को, समस्त दोष से रहित तथा सर्व लोक को सुख देने वाला दान का प्रकाशरूप कार्य उसी प्रकार अच्छा नहीं लगता, जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश उल्लू को अच्छा नहीं लगता है ।