
दानोपदेशनमिदं कुरुते प्रमोदं,
आसन्नभव्यपुरुषस्य न चेतरस्य ।
जातिः समुल्लसति दारु न भृङ्गसंगात्,
इन्दीवरं हसति चन्द्रकरैर्न चाश्मा॥53॥
अहो! दान-उपदेश निकट, भव्यों को ही आनन्द करे ।
सुमन भ्रमर से, कुमुदचन्द्र से, खिले, न काष्ठ-पाषाण खिले॥
अन्वयार्थ : आचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार भ्ररों के संग से चमेली ही विकसित होती है, लकड़ी विकसित नहीं होती । चन्द्रमा की किरणों से कमल ही प्रफुल्लित होता है, पाषाण नहीं । उसी प्रकार जिसको थोड़े ही काल में मोक्ष होने वाला है - ऐसे भव्य मनुष्य को ही यह दान का उपदेश, हर्ष उत्पन्न करने वाला होता है, अभव्य को यह दान का उपदेश, कुछ भी हर्ष का करने वाला नहीं है ।