
दुःखे वा समुपस्थितेऽथ मरणे, शोको न कार्यो बुधैः;
सम्बन्धो यदि विग्रहेण यदयं, सम्भूतिधात्र्येतयोः ।
तस्मात्तत्परिचिन्तनीयमनिशं, संसार-दुःख-प्रदो;
येनास्य प्रभवः पुरः पुनरपि, प्रायो न सम्भाव्यते॥5॥
देह-संग से दु:ख या मृत्यु, हो तो बुध नहिं शोक करें ।
क्योंकि देह तो दु:ख-शोक की, उत्पादक है भूमि अरे!॥
अत: सुधीजन वस्तु-स्वरूप-विचार निरन्तर किया करें ।
जिससे नाना दु:खदायक यह, देह पुन: फिर नहीं मिले॥
अन्वयार्थ : यद्यपि देह के सम्बन्ध से संसार में दुःख तथा शोक आकर उपस्थित होते हैं तो भी विद्वानों को किसी पदार्थ के लिए दुःख तथा शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि यह देह, दुःख तथा शोक को पैदा करने वाली भूमि है । इसलिए विद्वानों को निरन्तर उस आत्मस्वरूप का चिन्तवन करना चाहिए, जिससे नाना प्रकार के संसार-दुःखों को देने वाले इस शरीर की उत्पत्ति भविष्य में फिर से न हो ।