
दुर्वाराऽर्जितकर्मकारणवशा,-दिष्टे प्रणष्टे नरे;
यत् शोकं कुरुते तदत्र नितरा,-मुन्मत्तलीलायितम् ।
यस्मात्तत्र कृते न सिध्यति किमप्येतत्परं जायते;
नश्यन्त्येव नरस्य मूढ़मनसो, धर्मार्थकामादयः॥6॥
दुर्वारार्जित कर्मोदय से, जब मनुष्य को इष्ट-वियोग ।
होवे तो उन्मत्त हुआ वह, करता बिना प्रयोजन शोक॥
अरे! मूढ़ को व्यर्थ शोक से, कुछ भी प्राप्त नहीं होता ।
किन्तु धर्म अरु अर्थ-काम का, वह प्रयत्न भी खो देता॥
अन्वयार्थ : जिसका निवारण नहीं हो सकता तथा पूर्वभव में संचित कर्मरूपी कारण के वश से जो मनुष्य, अपने प्रिय स्त्री-पुत्र-मित्र आदि के नष्ट होने पर उन्मादी मनुष्य की लीला के समान इस संसार में निष्प्रयोजन अत्यन्त शोक करता है, उस मूर्ख मनुष्य को उस प्रकार के व्यर्थ शोक करने से कुछ भी नहीं मिलता, उस मूढ़ मनुष्य के धर्म-अर्थ-काम आदि का नाश हो जाता है । इसलिए विद्वानों को इस प्रकार का शोक कदापि नहीं करना चाहिए ।