
उदेति पाताय रविर्यथा तथा,
शरीरमेतन्ननु सर्वदेहिनाम् ।
स्वकालमासाद्य निजेऽपि संस्थिते,
करोति कः शोकमतः प्रबुद्धधी:॥7॥
सूर्य उदित हो अस्त हेतु, यह देह बिछुड़ने हेतु मिले ।
अत: कालवश प्रिय-वियोग हो, तो प्रबुद्ध नहिं शोक करें॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार सूर्य अस्त होने के लिए उदित होता है, उसी प्रकार यह शरीर भी निश्चय से नाश होने के लिए ही उत्पन्न होता है । इसलिए स्वकाल के अनुसार अपने प्रिय स्त्री, पुरुष आदि के मरने पर भी हिताहित के जानने वाले मनुष्य कदापि शोक नहीं करते ।