+ स्वकाल के अनुसार जीवन-मरण होने में वृक्ष का उदाहरण -
भवन्ति वृक्षेषु पतन्ति नूनं,
पत्राणि पुष्पाणि फलानि यद्वत् ।
कुलेषु तद्वत्पुरुषाः किमत्र,
हर्षेण शोकेन च सन्मतीनाम्॥8॥
वृक्षों पर ज्यों विविध पत्र-फल-पुष्प उपजते नशते हैं ।
त्यों प्रिय के आते-जाते, क्यों सुबुध हर्ष या शोक करें?॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार वृक्षों पर अपने-अपने काल के अनुसार नाना जाति के पत्ते, फूल, फल आदि उत्पन्न होते हैं तथा अपने-अपने काल के अनुसार ही वे नष्ट भी होते हैं; उसी प्रकार अपने-अपने कर्मों के अनुसार मनुष्य, उच्च-नीच आदि कुलों में जन्म लेते हैं तथा नष्ट भी होते हैं । इसलिए ऐसा भलीभाँति समझ कर, बुद्धिमानों को उनकी उत्पत्ति में हर्ष तथा नाश में शोक कदापि नहीं करना चाहिए ।