+ 'मृत्यु के पश्चात् शोक' - अन्धकार में नृत्य करने के समान -
(शार्दूलविक्रीडित)
दुर्लङ्घयाद्भवितव्यताव्यतिकरात् नष्टे प्रिये मानुषे;
यच्छोक: क्रियते तदत्र तमसि, प्रारभ्यते नर्तनम् ।
सर्वं नेशरमेव वस्तु भुवने, मत्वा महत्या धिया;
निर्धूताऽखिलदु:खसन्ततिरहो, धर्म: सदा सेव्यताम्॥9॥
होनहार व्यापार प्रबल है, अत: इष्ट-जन होते नष्ट ।
जो नर शोक करे वह मानो, अन्धकार में करता नृत्य॥
जग में सभी वस्तुएँ नश्वर, प्रबल बुद्धि से करो विचार ।
दु:ख-सन्तति का नाश करे, जो धर्म उसी का लो आधार॥
अन्वयार्थ : जिसका कष्ट से भी उल्लंघन नहीं हो सकता - ऐसी भवितव्यता (दैव) के व्यापार से अपने प्रिय स्त्री-पुत्र आदि के नष्ट होने पर भी जो मनुष्य शोक करता है, वह अन्धकार में नृत्य को आरम्भ करता है - ऐसा जान पड़ता है । अर्थात् अन्धकार में किये हुए नृत्य को कोई देख नहीं सकता । इसलिए जिस प्रकार अन्धकार में नृत्य करना व्यर्थ होता है; उसी प्रकार स्त्री-पुत्र आदि के लिए मनुष्य का शोक करना भी व्यर्थ है । अत: हे भव्य जीवों! अपने ज्ञान से संसार में सब चीजों को विनाशीक समझ कर, समस्त दु:खों की सन्तान को जड़ से उड़ाने वाले धर्म का ही तुम सदा सेवन करो ।