
पूर्वोपार्जितकर्मणा विलिखितं, यस्याऽवसानं यदा;
तज्जायेत तदैव तस्य भविनो, ज्ञात्वा तदेतद्ध्रुवम् ।
शोकं मुञ्च मृते प्रियेऽपि सुखदं, धर्मं कुरुष्वादरात्;
सर्पे दूरमुपागते किमिति, भोस्तद्घृष्टिराहन्यते॥10॥
पूर्वोपार्जित कर्मों द्वारा, लिखा गया जब जिसका अन्त ।
तभी मरण होता है उसका, यह निश्चित मानो हे भव्य!॥
प्रिय-वियोग हो किन्तु शोक तज, सुखद धर्म को आराधो ।
साँप निकल जाने पर, रेखा पर प्रहार है व्यर्थ अहो!॥
अन्वयार्थ : पूर्वभव में संचित कर्म के द्वारा जिस प्राणी का अन्त, जिस काल में लिख दिया गया है; उस प्राणी का अन्त, उसी काल में होता है - ऐसा भलीभाँति निश्चय करके हे भव्य जीवों! तुम अपने प्रिय स्त्री-पुत्र आदि के मरने पर भी शोक छोड़ दो तथा बड़े आदर से धर्म का आराधन करो क्योंकि सर्प के दूर चले जाने पर उसकी रेखा को पीटना व्यर्थ है ।