+ जगत् में मूर्ख कौन? और मूर्ख-शिरोमणि कौन? -
ये मूर्खा भुवि तेऽपि दुःखहतये, व्यापारमातन्वते;
सा माभूदथवा स्वकर्मवशत:, तस्मान्न ते तादृशाः ।
मुर्खान्मूर्खशिरो णीन् ननु वयं, तानेव मन्यामहे;
ये कुर्वन्ति शुचं मृते सति निजे, पापाय दुःखाय च॥11॥
कर्मोदय वश हुए दु:खों से, बच सकते या नहीं बचें ।
किन्तु दु:खों से बचने हेतु, मूर्ख लोग ही यत्न करें॥
महामूर्ख हम उन्हें न मानें, मूर्ख-शिरोमणि तो वे हैं ।
प्रिय-वियोग में पाप और, दु:ख का कारण जो शोक करें॥
अन्वयार्थ : अपने कर्म के वश से चाहे दुःखों की निवृत्ति हो अथवा न हो तो भी दुःख की निवृत्ति के लिए जो व्यापार आदि करते हैं, वे भी संसार में मूर्ख हैं, लेकिन हम उनको अतिमूर्ख नहीं मानते; किन्तु जो अपने प्रिय स्त्री-पुत्र आदि के मरने पर पाप के लिए अथवा दुःखों की उत्पत्ति के लिए शोक करते हैं, उन्हीं को निश्चय से हम मूर्ख-शिरोणि अर्थात् वज्र मूर्ख मानते हैं । इसलिए विद्वानों को स्त्री-पुत्र आदि के मरने पर कदापि शोक नहीं करना चाहिए ।