
किं जानासि न किं शृणोषि न न किं, प्रत्यक्षमेवेक्षसे;
निःशेषं जगदिन्द्रजालसदृशं, रम्भेव सारोज्झितम् ।
किं शोकं कुरुषेऽत्र मानुषपशो, लोकान्तरस्थे निजे;
तत्किञ्चित् कुरु येन नित्यपरमानन्दास्पदं गच्छसि॥12॥
जग है इन्द्रजाल-सम नश्वर, केलि-स्तम्भ समान असार ।
तूने क्या प्रत्यक्ष न देखा, जाना अथवा नहीं सुना॥
अन्य लोक में बैठे प्रियजन, फिर क्यों उनका शोक करें?
कुछ ऐसा कर अरे! कि जिससे, शाश्वत परमानन्द मिले॥
अन्वयार्थ : हे मूढ़ मनुष्य! यह समस्त जगत् इन्द्रजाल के समान अनित्य है तथा केले के स्तम्भ के समान निस्सार है । इस बात को क्या तू नहीं जानता है? अथवा सुनता नहीं है? या प्रत्यक्ष देखता नहीं है? अत: स्त्री-पुत्र आदि के दूसरे लोक में रहने पर भी तू उनके लिए इस संसार में व्यर्थ शोक करता है । अरे! कोई ऐसा काम कर, जिससे तुझे अविनाशी तथा उत्तम सुख के देने वाले स्थान की प्राप्ति हो ।