
जातो जनो म्रियत एव दिने च मृत्योः;
प्राप्ते पुनस्त्रिभुवनेऽपि न रक्षकोऽस्ति ।
तद्यो मृते सति निजेऽपि शुचं करोति;
पूत्कृत्य रोदिति वने विजने स मूढ:॥13॥
जो जन्मे वह निश्चित मरता, कोई नहीं रक्षक जग में ।
स्वजन मृत्यु पर शोक करे जो, रोता वह निर्जन वन में॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य पैदा हुआ है, वह मृत्यु के दिन अवश्य ही मरता है । मरते समय तीनों लोक में उसकी कोई भी रक्षा नहीं कर सकता है । इसलिए आचार्य कहते हैं कि जो मनुष्य, अपने प्रिय स्त्री-पुत्र आदि के मरने पर शोक करता है; वह मनुष्य, जहाँ पर कोई नहीं - ऐसे वन में जाकर फुक्का मारह्नमार कर रोता है - ऐसा जान पड़ता है ।