
इष्टक्षयो यदिह ते यदनिष्टयोगः;
पापेन तद्भवति जीव पुराकृतेन ।
शोकं करोषि किमु तस्य कुरु प्रणाशं;
पापस्य तौ न भवतः पुरतोऽपि येन॥14॥
इष्ट-वियोग अनिष्ट-योग हो, तुझे पूर्वकृत पापों से ।
शोक करे क्यों? पाप नाश कर, योग-वियोग न हो फिर से॥
अन्वयार्थ : हे जीव! यह जो तुझे इष्ट स्त्री-पुत्र आदि के नाश का तथा अनिष्ट सर्प आदि का सम्बन्ध होता है; वह तेरे पूर्वकाल में संचय किये हुए पाप के उदय से ही होता है । इसलिए तू शोक क्यों करता है? उस पाप का सर्वथा नाश कर, जिससे फिर तुझे भविष्य में इष्ट-वियोग तथा अनिष्ट-संयोग का उदय न होवे ।