
नष्टे वस्तुनि शोभनेऽपि हि तदा, शोकः समारभ्यते;
तल्लाभोऽथ यशोऽथ सौख्यमथवा, धर्मोऽथवा स्याद्यदि ।
यद्येकोऽपि न जायते कथमपि, स्फारैः प्रयत्नैरपि;
प्रायस्तत्र सुधीर्मुधा भवति कः, शोकोग्रराक्षसवशः॥15॥
इष्ट वस्तुओं के विनाश में, तभी उचित करना है शोक ।
वस्तु मिले या यश हो अथवा, धर्म और हो सुख का भोग॥
किन्तु एक भी नहिं हो इनमें, चाहे जितना करें प्रयत्न ।
तो फिर कौन सुधी हो सकता, व्यर्थ शोक-राक्षस के वश॥
अन्वयार्थ : प्रिय वस्तु के नाश होने पर भी शोक करना तब उचित है, जबकि उसकी प्राप्ति हो जाए अथवा शोक करने से कीर्ति फैले अथवा सुख या धर्म हो; किन्तु बड़े से बड़े अनेक प्रयत्नों के करने पर भी उपर्युक्त वस्तुओं में से किसी भी वस्तु की प्राप्ति नहीं दिख पड़ती । इसीलिए विद्वान् पुरुष, इष्ट वस्तु के नाश होने पर भी प्रायः कुछ भी व्यर्थ शोक नहीं करते ।