
एकद्रुमेनिशि वसन्ति यथा शकुन्ताः;
प्रातः प्रयान्ति सहसा सकलासु दिक्षु ।
स्थित्वा कुले बत तथान्यकुलानि मृत्वा;
लोकाः श्रयन्ति विदुषा खलु शोच्यते कः॥16॥
एक वृक्ष पर पक्षी आते, प्रात: चहुँ दिशि गमन करें ।
त्यों कुटुम्ब के प्राणी परभव, जाते बुध नहिं शोक करें॥
अन्वयार्थ : रात्रि के समय जिस प्रकार एक ही वृक्ष पर नाना देशों से आकर पक्षी निवास करते हैं तथा सबेरा होने पर शीघ्र ही वे अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग उड़ जाते हैं; उसी प्रकार बहुत-से मनुष्य एक कुल में जन्म लेकर, पुनः अपने कर्म के अनुसार मर कर, नाना कुलों में जन्म लेते हैं - ऐसी संसार की स्थिति को जान कर, विद्वान् लोग कदापि शोक नहीं करते ।