
दुःखव्यालसमाकुलं भववनं, जाड्यान्धकाराश्रितं;
तस्मिन्दुर्गतिपल्लिपातिकुपथैः, भ्राम्यन्ति सर्वेऽङ्गिनः ।
तन्मध्ये गुरुवाक्प्रदीपममलं, ज्ञानप्रभाभासुरं;
प्राप्यालोक्य च सत्पथं सुखपदं, याति प्रबुद्धो धु्रवम्॥17॥
यह भव-वन है दु:ख सर्प, एवं अज्ञान-तिमिर से व्याप्त ।
भटक रहे हैं जीव जगत् के, दुर्गति भीलों के उन्मार्ग॥
निर्मल ज्ञान-प्रभा से जगमग, गुरु-वचनों के दीपक से ।
मार्ग देख कर कोई चतुर नर, शिवपद निश्चित प्राप्त करे॥
नाना प्रकार के दुःखरूपी सर्प और हस्तियों से व्याप्त तथा अज्ञानरूपी
अन्वयार्थ : अन्धकार से युक्त और नरकादि गतिरूपी भीलों के भयंकर मार्गों से सहित इस संसाररूपी भव-वन में समस्त प्राणी भटकते फिरते हैं, किन्तु उन प्राणियों में चतुर मनुष्य, निर्मल ज्ञानरूपी प्रभा से दैदीप्यमान - ऐसे गुरुओं के वचनरूपी दीपक को पाकर तथा उस वचनरूपी दीपक के द्वारा उत्तम मार्ग को देख कर, मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है ।