
आक्रन्दं कुरुते यदत्र जनता, नष्टे निजे मानुषे;
जाते यच्च मुदं तदुन्नतधियो, जल्पन्ति वातूलताम् ।
यज्जाड्यात्कृतदुष्टचेष्टितभवत्, कर्मप्रबन्धोदयात्;
मृत्यूत्पत्ति-परम्परा-मयमिदं, सर्वं जगत्सर्वदा॥23॥
अपने प्रिय की मृत्यु समय पर, जो जन चीख-चीख रोते ।
तथा जन्म में हर्षित होते, उन्हें सुधी 'पागल' कहते॥
क्योंकि जगत् अज्ञान-जन्य, कार्यों से कर्म-बन्ध करता ।
कर्मोदय से जग में जन्म-मरण परिपाटी चले सदा॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, अपने प्रिय मनुष्य के मरने पर तो चीख मार-मार कर रोते हैं तथा उत्पन्न होने पर हर्ष मनाते हैं; उनकी उस प्रकार की चेष्टा को बुद्धिमान् पुरुष, बावलापन कहते हैं क्योंकि यह समस्त जगत् तो अज्ञान से की हुई खोटी-खोटी क्रिया से उत्पन्न कर्मों के बन्धन के उदय से सदा मरण तथा जन्मों की परम्परा-स्वरूप ही हैं ।