+ संसार में आपत्ति के आने पर शोक करना व्यर्थ -
गुर्वी भ्रान्तिरियं जडत्वमथवा, लोकस्य यस्माद्वसन्;
संसारे बहुदुःखजालजटिले, शोकीभवत्यापदि ।
भूतप्रेतपिशाचफेरवचिता,-पूर्णे श्मशाने गृहं;
कः कृत्वा भयदादमंगलकृते भावाद् भवेच्छंकितः॥24॥
विविध दु:खों से व्याप्त जगत् में, रहने पर भी शोक करें ।
यह तो जग की मूढ़बुद्धि है, अथवा बहुत बड़ा भ्रम है॥
भूत-पिशाचादिक की लीला-मय मसान में वास करें ।
फिर क्यों भयप्रद और अमंगल-मय घटना से कोई डरें ?
अन्वयार्थ : लोक का यह एक बड़ा भारी भ्र है अथवा उसकी मूर्खता कहनी चाहिए कि अनेक दुःखों से व्याप्त इस संसार में रहता हुआ भी आपत्ति के आने पर शोक करता है क्योंकि जो भूत-प्रेत-पिशाच, फेंकार शब्द और चिता आदि से व्याप्त श्मशान में घर बना कर तथा वहाँ रह कर भी ऐसा कौन पुरुष होगा, जो ऐसे अमंगल स्वरूप तथा नाना प्रकार के भय को करने वाले पदार्थों से भय करेगा?